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मेरे गांव का बचपन Nostalgia of my village

वो गाँव के मैदान जहाँ हम खेलते थे और साथ मे वो बुजुर्ग जो हमारे साथ खुश होते थे।

The village where we played and along with those elderly people who were happy with us






गांव-   हमारे गाँव की एक छोटी सी गली मे शाम के 5 बजते ही बहुत चहल पहल शुरु हो जाती थी कोई पिट्ठू गरम खेलता था तो कोई लुका छिपी।
   बहुत मन लगता था बडे़ बूढे़ चारपाई पर बैठकर हमारे खेल को देखकर पूरा लुत्फ उठाया करते थे। कभी- कभी😱😱😱
तो बीच बीच में शोर मचा दिया करते थे ।
पकड़ा गया,पकड़ा गया चल जाके एक तरफ बैठ जा चिडी़ मार कहीं का।



पकड़ा गया -  इतने में दूसरा भी पकड़ लिया सारे बड़े बूढ़े ठहाका लगाकर हँसने लगते हैं । एक अजीब सी खुशी व रोनक उन सबके चेहरों पर देखने को मिलती थी।
लेकिन आज मैं बहुत मायूस था🤔🤔🤔🤔
बैठकर सो मेरे मन में एक ही सवाल उठ रहा था कि एसा क्यो होता है?
जो कल हमारे साथ थे आज वो कहाँ चले गये ?
जिस गली में इतनी रोनक थी वो आज शांत होकर बैठ गयी मानो किसी का इंतजार कर रही हो।
मुझे आज एक वाणी की दो लाइने बार -बार याद आ रही थीं। जो शायद मैने कुछ महीने पहले सुनी थीं।
😭😭😭😭😭😢😢😢
बोलते थे कहाँ गये,बोलते थे कहाँ गये****
बोलते थे कहाँ गये ,बोलते थे कहाँ गये.......?

खेल-  क्योकि कल तक हमारे खेल को देखकर हँसने वाले उन बूढे व्यक्तियों में मेरे दादा जी भी शामिल थे जो आज कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे।
मैं आज बहुत अकेला हो गया हूँ वो मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे।
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